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"टुटा तारा"


शाम नहीं गवाना मंजिल की तलाश में,
निकली हूँ  मैं तो एक खोए रास्ते की आस में।
फ़ुरसत ना मिले कदमों को रूकने की,
ऐसा बहता किनारा बनना है।।
उस चमक-दमक से दूर कही
बिखरु तो सब करे मिन्नतें,
मुझे वो टुटा तारा बनना है।।






थोड़ा-सा होश थोड़ी मदहोशी रहे,
गूँजे बस धड़कने,बाकि चारों ओर खामोशी रहे।
बेखबर होकर ठिकाने से निकल चले 
मुसाफर बनकर,
आसमां का वो बादल आवारा बनना है।।
उस चमक-दमक से दूर कही
बिखरु तो सब करे मिन्नतें,
मुझे वो टुटा तारा बनना है।।


कोई अनोखी बात ना हो उसमे,
पर राहत का एहसास हो जिसमे।
आकर्षण से नहीं, असमंजस से देखे मेरी ओर सब,
गुलशन में रहकर उसका फीका नजारा बनना है।।
उस चमक-दमक से दूर कही
बिखरु तो सब करे मन्नतें,
मुझे वो टुटा तारा बनना है।।

                                     ■▪नीलिमा मण्डल

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